रायपुर (AkhandBharatHNKP.Com)। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश की नई व्यवस्था ने गरीब परिवारों की उम्मीदों को झटका दिया है। सत्र 206-27 से नर्सरी को आरटीई की एंट्री क्लास से हटा दिया गया है, जिससे पूरे प्रदेश में करीब 33 हजार सीटें कम हो गई हैं।

बता दें कि पिछले साल तक निजी स्कूलों में 53 हजार सीटें उपलब्ध थीं, लेकिन अब केवल कक्षा-1 में प्रवेश होगा, जिसमें सिर्फ 19536 सीटें बची हैं। इसका सबसे बड़ा असर 3 से 5 साल के बच्चों पर पड़ा है, जो अब आरटीई के दायरे से बाहर हो गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदेश के अधिकांश सरकारी स्कूलों में प्री-प्राइमरी (नर्सरी, पीपी-1, पीपी-2) की पढ़ाई का ढांचा ही नहीं है। केवल कुछ चुनिंदा आत्मानंद स्कूलों में ही यह सुविधा मौजूद है। इस वजह से छोटे बच्चों के लिए राइट टू एजुकेशन अब केवल कागजों तक सीमित रह गया है। गरीब माता-पिता के सामने अब मुश्किल विकल्प हैंया तो भारी फीस देकर निजी स्कूल में दाखिला कराएं, या बच्चों को आंगनबाड़ी भेजें, या फिर कुछ साल तक घर पर ही बैठाएं। आरटीई के तहत आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और फॉर्म 31 मार्च तक भरे जाने हैं। गौरतलब है कि आरटीई एक्ट में 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है।
प्री-प्राइमरी शिक्षा बच्चों के शुरुआती विकास के लिए महत्वपूर्ण
स्कूल शिक्षा विभाग ने 12 साल पहले नर्सरी से ही आरटीई का प्रावधान लागू किया था, जिससे निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आरटीई में आरक्षित रहती थीं। नए बदलाव के बाद अब सिर्फ कक्षा-1 में प्रवेश दिया जाएगा। शिक्षाविदों का कहना है कि प्री-प्राइमरी शिक्षा बच्चों के शुरुआती विकास के लिए महत्वपूर्ण है। यदि इस स्तर की पढ़ाई नहीं होगी, तो बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसलिए सरकारी स्कूलों में नर्सरी की व्यवस्था सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि सभी बच्चों को समान और मजबूत शिक्षा की शुरुआत मिल सके।

