सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद किताब की बिक्री और ऑनलाइन उपलब्धता रोकी गई
नई दिल्ली (एजेंसी)। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने आठवीं कक्षा की सोशल साइंस की एक नई पाठ्यपुस्तक में शामिल ज्यूडिशियरी करप्शन शीर्षक वाले अध्याय को लेकर उठे विवाद के बाद बिना शर्त माफी मांग ली है। इस विवाद के चलते परिषद ने पूरी किताब को ही वापस बुला लिया है और फिलहाल इसे बाजार तथा वेबसाइट दोनों जगह से हटा दिया गया है।
दरअसल, एनसीईआरटी की सोशल साइंस की पुस्तक एक्सप्लोरिंग सोसाइटी : इंडिया एंड बियॉन्ड (पार्ट-2) में द रोल ऑफ ज्यूडिशियरी इन अवर सोसाइटी नामक अध्याय के अंतर्गत न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित एक सेक्शन जोड़ा गया था। इसी विषयवस्तु को लेकर विवाद खड़ा हो गया और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। इसके बाद एनसीईआरटी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि परिषद के निदेशक और अन्य सदस्य इस प्रकरण को लेकर बिना किसी शर्त के माफी मांगते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी कड़ी नाराजगी
25 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने भी नाराजगी जाहिर की थी। सुनवाई के बाद किताब की बिक्री पर रोक लगा दी गई। सूत्रों के अनुसार एनसीईआरटी ने इस अध्याय का सुझाव देने वाले विशेषज्ञों और इसे मंजूरी देने वाले अधिकारियों की एक आंतरिक बैठक भी बुलाई। साथ ही किताब को परिषद की आधिकारिक वेबसाइट से भी हटा दिया गया। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने यह मामला उठाया था। सुनवाई के दौरान सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जा रहा है, जो बेहद चिंताजनक है। वहीं सिंघवी ने कहा कि पाठ्यपुस्तक में ऐसा प्रतीत होता है मानो राजनीति, नौकरशाही और अन्य संस्थानों में भ्रष्टाचार है ही नहीं।

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि दुनिया में किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि मामला एक सोची-समझी साजिश जैसा प्रतीत होता है और अदालत इस मामले को गंभीरता से देख रही है। इस मामले पर एनसीईआरटी के चेयरमैन दिनेश प्रसाद सकलानी ने कोई सीधा बयान नहीं दिया। परिषद के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है, इसलिए इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।
शासन के तीनों अंगो का होना था उल्लेख
हालांकि सरकारी सूत्रों का कहना है कि यदि पाठ्यपुस्तक में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को शामिल करना था, तो शासन के तीनों अंगों—कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका—का संतुलित उल्लेख किया जाना चाहिए था। केवल न्यायपालिका पर केंद्रित चर्चा से गलत संदेश जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक न्यायपालिका से जुड़े आंकड़े संसदीय अभिलेखों और नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड में उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें शामिल करने से पहले तथ्यों का सही सत्यापन और परामर्श आवश्यक था।
नई पाठ्यपुस्तक में जोड़ा गया था अध्याय
एनसीईआरटी ने 23 फरवरी को आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए सोशल साइंस की नई पाठ्यपुस्तक जारी की थी, जिसे शैक्षणिक सत्र 2026-27 से स्कूलों में पढ़ाया जाना था। इसका पहला भाग जुलाई 2025 में प्रकाशित किया गया था। इस किताब में न्यायपालिका की भूमिका से जुड़े अध्याय में करप्शन इन द ज्यूडिशियरी शीर्षक का एक सेक्शन जोड़ा गया था। इसमें बताया गया था कि भ्रष्टाचार, लंबित मामलों की बड़ी संख्या और जजों की कमी भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौतियां हैं। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया था कि जज आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो उनके अदालत के भीतर और बाहर के आचरण को नियंत्रित करती है। पुस्तक में इंसाफ में देरी इंसाफ से वंचित करने के समान है शीर्षक के तहत न्यायालयों में लंबित मामलों के आंकड़े भी दिए गए थे। इसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट में लगभग 81 हजार, हाईकोर्ट में करीब 62 लाख 40 हजार और जिला व अधीनस्थ अदालतों में लगभग 4 करोड़ 70 लाख मामले लंबित बताए गए थे।
पूर्व सीजेआई का भी उल्लेख
किताब में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर.गवई के एक बयान का भी जिक्र किया गया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार या अनुचित आचरण के मामलों से जनता के विश्वास को नुकसान पहुंचता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि पारदर्शी और निर्णायक कार्रवाई के माध्यम से इस विश्वास को दोबारा मजबूत किया जा सकता है।
वेबसाइट और बाजार से हटाई गई किताब
विवाद बढऩे के बाद आठवीं कक्षा की इस पाठ्यपुस्तक को एनसीईआरटी की वेबसाइट से हटा दिया गया है। साथ ही इसकी ऑफलाइन बिक्री भी रोक दी गई है। बताया जा रहा है कि नई शिक्षा नीति 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क के तहत एनसीईआरटी सभी कक्षाओं के लिए नई किताबें तैयार कर रहा है। कोरोना महामारी के बाद पाठ्यक्रम में कई बदलाव किए गए हैं और पहली से आठवीं कक्षा तक की नई किताबें 2025 में प्रकाशित की जा चुकी हैं।
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