बिलासपुर नसबंदी कांड : 11 साल बाद आया फैसला, सर्जन डॉ. आरके गुप्ता को 2 साल की सजा

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      बिलासपुर (AkhandBharatHNKP.Com)। बहुचर्चित बिलासपुर नसबंदी कांड मामले में करीब 11 साल 4 महीने बाद जिला अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। एडीजे कोर्ट के न्यायाधीश शैलेश कुमार ने मामले में सर्जन डॉ. आरके गुप्ता को दोषी ठहराते हुए गैर इरादतन हत्या के अपराध में 2 साल की सजा और 25 हजार रुपए जुर्माने से दंडित किया है।

          बिलासपुर नसबंदी कांड

          इसके साथ ही अदालत ने उन्हें आईपीसी की धारा 337 के तहत 6 महीने की सजा और 500 रुपए जुर्माना तथा एक अन्य धारा में 1 महीने की सजा भी सुनाई है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कम समय में अधिक ऑपरेशन करने और लापरवाही बरतने के कारण यह दुखद घटना हुई थी। वहीं, इस मामले में दवा सप्लाई से जुड़े महावर फार्मा और कविता फार्मास्यूटिकल्स के संचालकों सहित पांच आरोपियों—रमेश महावर, सुमित महावर, राकेश खरे, राजेश खरे और मनीष खरे—को सबूतों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया गया।

          2014 में सामने आया था मामला

          यह मामला नवंबर 2014 का है, जब सकरी क्षेत्र के नेमिचंद्र जैन अस्पताल सहित पेंडारी और पेंड्रा में सरकारी नसबंदी शिविर आयोजित किए गए थे। इन शिविरों में बड़ी संख्या में महिलाओं की नसबंदी की गई थी। ऑपरेशन के बाद कई महिलाओं की तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद 100 से अधिक महिलाओं को सिम्स, जिला अस्पताल और निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया था। इस दौरान 15 महिलाओं की मौत हो गई थी, जिससे पूरे प्रदेश और देश में हड़कंप मच गया था। इस घटना के बाद मामला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा था। उस समय कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी बिलासपुर पहुंचे थे और पीडि़त परिवारों से मुलाकात की थी।

          संक्रमण और दवा पर उठे थे सवाल

          शुरुआती पोस्टमॉर्टम और कल्चर रिपोर्ट में महिलाओं की मौत का कारण सेप्टिसिमिया और सेप्टिक शॉक बताया गया था, जो आमतौर पर गंदे उपकरणों और अस्वच्छ माहौल से होने वाले संक्रमण से होता है। जांच में यह भी सामने आया था कि जिस कमरे में ऑपरेशन किए गए थे, वहां उपकरणों को ठीक तरह से स्टरलाइज नहीं किया गया था। हालांकि बाद में स्वास्थ्य विभाग ने दावा किया था कि महिलाओं को दी गई सिप्रोसीन-500 दवा में चूहे मारने वाले जहर जिंक फास्फाइड के अंश मिले थे। इसी आधार पर दवा निर्माता कंपनी के संचालकों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था और कई दवाओं पर प्रतिबंध भी लगाया गया था।

          लैब रिपोर्ट से कमजोर पड़ा मामला

          बाद में जांच के दौरान दवा में जहर होने का दावा गलत साबित हुआ। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी की रिपोर्ट, जिसका हवाला दिया गया था, उसने ऐसी किसी जांच से इनकार कर दिया। वहीं छत्तीसगढ़ स्टेट फॉरेंसिक लैब ने भी दवा में जहर की पुष्टि नहीं की। इन विरोधाभासी तथ्यों और जांच में बरती गई लापरवाही के चलते अदालत में अभियोजन पक्ष अन्य पांच आरोपियों की भूमिका साबित नहीं कर सका। इसी कारण कोर्ट ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

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