23 साल बाद आया फैसला, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित को उम्रकैद की सजा
बिलासपुर (AkhandBharatHNKP.Com)। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित राम अवतार जग्गी हत्याकांड में करीब 23 वर्ष बाद बड़ा न्यायिक फैसला सामने आया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है।

हाईकोर्ट ने सीबीआई की स्पेशल कोर्ट द्वारा अमित जोगी को दी गई क्लीन चिट को गलत और हास्यास्पद बताते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि इस पूरे हत्याकांड के मास्टरमाइंड अमित जोगी ही थे और साजिश उनके इशारे पर रची गई थी। मामले की पृष्ठभूमि में प्रदेश की राजनीति का बड़ा टकराव सामने आया। विद्याचरण शुक्ल और अजीत जोगी के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर मतभेद गहराते गए। इसके बाद विद्याचरण शुक्ल ने कांग्रेस छोड़कर एनसीपी का दामन थाम लिया और अपने साथ कई नेताओं को जोड़ा, जिनमें राम अवतार जग्गी प्रमुख थे। साल 2003 के विधानसभा चुनाव से पहले एनसीपी की रैलियों ने प्रदेश में राजनीतिक माहौल गरमा दिया था। इसी दौरान 4 जून 2003 को रायपुर के मौदहापारा क्षेत्र में राम अवतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई, जिससे पूरे प्रदेश में सनसनी फैल गई।
पुलिस ने बताया लूट का मामला, फिर सीबीआई जांच
घटना के बाद प्रारंभिक जांच में पुलिस ने इसे लूट का मामला बताया, लेकिन जल्द ही मामला राजनीतिक हत्या के रूप में सामने आया। परिजनों और विपक्ष के दबाव के बाद मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने विस्तृत जांच के बाद करीब 1000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल कर अमित जोगी को साजिश का मुख्य सूत्रधार बताया।
जग्गी को खत्म करने बैठक में बनी साजिश
सीबीआई जांच में सामने आया कि 21 मई 2003 को रायपुर के होटल ग्रीन पार्क में एक अहम बैठक हुई थी। इस बैठक में कथित तौर पर अमित जोगी ने एनसीपी की रैली को रोकने के लिए राम अवतार जग्गी को खत्म करने की बात कही थी। आकाश चैनल के तत्कालीन डायरेक्टर रेजिनाल्ड जेरेमिया की गवाही को कोर्ट ने महत्वपूर्ण माना। उन्होंने बताया कि जोगी के निर्देश पर कोलकाता जाकर शूटर चिमन सिंह को 5 लाख रुपए दिए गए थे।
अमित को छोड़ सभी 28 आरोपियों को दी सजा
सीबीआई स्पेशल कोर्ट ने 31 मई 2007 को दिए फैसले में अन्य 28 आरोपियों को सजा सुनाई थी, जबकि अमित जोगी को बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस फैसले को पूरी तरह गलत बताते हुए कहा कि यह मानना हास्यास्पद है कि अन्य आरोपी बिना जोगी की जानकारी के इतनी बड़ी साजिश को अंजाम दे सकते हैं। मुख्य शूटर चिमन सिंह, अमित जोगी का परिचित था। उसे रायपुर बुलाने और ठहराने की व्यवस्था जोगी के करीबियों ने की थी। होटल ग्रीन पार्क और सीएम हाउस में कई संदिग्ध बैठकें हुईं। कॉल डिटेल्स से आरोपियों के बीच लगातार संपर्क की पुष्टि हुई। कोर्ट ने माना कि 2003 के चुनाव से पहले राम अवतार जग्गी तत्कालीन सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन गए थे और उन्हें रास्ते से हटाना ही साजिश का उद्देश्य था।
78 पन्ने में हाईकोर्ट ने अमित जोगी को बताया हत्या का मास्टरमाइंड
डिवीजन बेंच ने 78 पन्नों के विस्तृत फैसले में अमित जोगी को प्रिंसिपल आर्किटेक्ट बताया। कोर्ट ने कहा कि अपने प्रभाव का उपयोग कर उन्होंने न केवल हत्या करवाई, बल्कि जांच को भटकाने के लिए पुलिस तंत्र का दुरुपयोग भी किया। फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि घटना के बाद फर्जी आरोपियों को सरेंडर कराया गया, ताकि असली दोषियों को बचाया जा सके। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष द्वारा बार-बार स्थगन की मांग और वकीलों में बदलाव को हाईकोर्ट ने ‘मामले को लटकाने की रणनीति बताया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार मामले का शीघ्र निपटारा जरूरी है।
अमित जोगी की याचिका पर 20 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई
अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है, लेकिन फिलहाल उन्हें कोई राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए 20 अप्रैल की तारीख तय की है। जोगी की ओर से दो आदेशों को चुनौती दी गई है। सीबीआई को अपील करने की अनुमति और हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसमें उन्हें हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। सोमवार को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजीव मेहता की बेंच में अमित जोगी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी, विवेक तन्खा और सिद्धार्थ दवे ने पक्ष रखा। वकीलों ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने अपने फैसलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया और बिना सुनवाई का मौका दिए आदेश जारी किया। अब इस केस में 20 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई और फैसले पर सबकी निगाहें टिकी हुई है।
किसे कितनी सजा मिली थी
सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने 31 मई 2007 को फैसला दिया था, इसमें इस आधार पर आरोपियों को अलग-अलग सजा सुनाई गई थी। सिर्फ अमित जोगी को बरी किया गया था। मुख्य साजिशकर्ता और हत्या के दोषी शूटर चिमन सिंह, साजिशकर्ता याहया ढेबर, अभय गोयल और फिरोज सिद्दीकी को आईपीसी की धारा 302 और 120बी के तहत उम्रकैद मिली थी। हत्या में शामिल अन्य आरोपी को धारा 302/34 के तहत सजा पाने वालों में शिवेंद्र सिंह परिहार, विनोद सिंह राठौर, राकेश कुमार शर्मा, अशोक सिंह भदौरिया, संजय सिंह कुशवाहा, राजू भदौरिया, रवींद्र सिंह, नर्सी शर्मा, सत्येंद्र सिंह, विवेक सिंह भदौरिया, धर्मेंद्र सिंह भदौरिया, सुनील गुप्ता, अनिल पचौरी और हरिश्चंद्र शामिल थे। तत्कालीन सीएसपी अमरीक सिंह गिल, तत्कालीन थाना प्रभारी वीके पांडेय और प्रभारी क्राइम स्क्वॉड राकेश चंद्र त्रिवेदी को जांच को गुमराह करने और फर्जी सबूत बनाने का दोषी माना गया था। साजिश में शामिल अन्य सूर्यकांत तिवारी सहित फर्जी आरोपी अविनाश सिंह, जम्बवंत, श्याम सुंदर, विनोद सिंह राजपूत और विश्वनाथ राजभर को साजिश में शामिल ठहराया था। वहीं, महंत उर्फ बुल्टू पाठक और सुरेश सिंह सरकारी गवाह बने, जबकि विक्रम शर्मा की मौत हो गई।
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