राज्य सरकार का आदेश निरस्त; चार सप्ताह में नया फैसला लेने के निर्देश
बिलासपुर (AkhandBharatHNKP.Com)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि शादी के बाद बेटी या बहन का अपने मायके से संबंध समाप्त नहीं हो जाता। न्यायालय ने कहा कि केवल विवाहित होने के आधार पर किसी महिला को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें विवाहित बहन को अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार किया गया था।
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने कहा कि यदि परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी निभाने की स्थिति में शादीशुदा बेटी या बहन है, तो उसे भी अनुकंपा नियुक्ति का समान अधिकार प्राप्त है। अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को आर्थिक संकट से उबारना है, न कि वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव करना। मामला बिलासपुर के नेहरू नगर निवासी दुर्गेश मिश्रा से जुड़ा है, जो जांजगीर-चांपा में जिला लोक अभियोजन अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। 13 जून 2018 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। वे अविवाहित थे। इसके बाद उनकी वृद्ध मां तारा मिश्रा ने राज्य शासन की अनुकंपा नियुक्ति नीति के तहत अपनी विवाहित बेटी अमिता दुबे को नौकरी देने के लिए आवेदन किया था। राज्य शासन के गृह एवं सामान्य प्रशासन विभाग ने सितंबर 2019 में यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि अनुकंपा नियुक्ति नीति में विवाहित बहन को नौकरी देने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
संवैधानिक समानता के सिद्धांत पर दिया फैसला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि शादी होने से बेटी या बहन का अपने मूल परिवार से रिश्ता समाप्त नहीं होता। जब विवाहित भाई को परिवार का सदस्य माना जाता है, तो केवल विवाह के आधार पर बहन के साथ अलग व्यवहार करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने भी इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि वर्तमान समय में अनेक शादीशुदा बेटियां और बहनें अपने माता-पिता तथा परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी निभाती हैं। इसलिए केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर उन्हें अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के 19 सितंबर 2019 के आदेश को रद्द करते हुए संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर नियमों के अनुरूप पुनर्विचार कर चार सप्ताह के भीतर नया एवं सकारात्मक निर्णय लिया जाए।

