बिलासपुर (AkhandBharatHNKP.Com)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर अहम निर्देश जारी करते हुए राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को चार माह के भीतर सहानुभूतिपूर्वक निर्णय लेने को कहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार एक संवैधानिक नियोक्ता है और वह गरीब कर्मचारियों के अधिकारों की अनदेखी कर बजट संतुलन नहीं बना सकती।
न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जो कर्मचारी वर्षों से मूलभूत और आवश्यक सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें लंबे समय तक अस्थायी बनाए रखना उनके अधिकारों और गरिमा का उल्लंघन है। यह मामला वन विभाग के 18 से अधिक कर्मचारियों से जुड़ा है, जो वर्ष 2006 से 2016 के बीच कंप्यूटर ऑपरेटर, कार्यालय सहायक और सुरक्षा कर्मी के रूप में नियुक्त हुए थे। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि वे 10 वर्षों से अधिक समय से निरंतर सेवा दे रहे हैं और अब अन्य सरकारी नौकरियों के लिए आयु सीमा भी पार कर चुके हैं। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार की उस नीति पर भी नाराजगी जताई, जिसमें नियमित नियुक्तियों के बजाय अस्थायी व्यवस्था और आउटसोर्सिंग को बढ़ावा दिया जाता है।
अदालत ने कहा कि यदि काम का स्वरूप स्थायी और सतत है, तो कर्मचारियों को अस्थायी रखना न्यायसंगत नहीं है। वहीं, राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत वित्तीय तंगी के तर्क को अदालत ने खारिज करते हुए कहा कि आर्थिक सीमाओं का हवाला देकर कर्मचारियों के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पूर्व के मामलों नरेंद्र कुमार तिवारी और धर्म सिंह का उल्लेख करते हुए कहा कि इन निर्णयों की भावना के अनुरूप कर्मचारियों के मामलों पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, याचिकाकर्ताओं को नए सिरे से आवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता भी दी गई है।

