नदी बचेगी तो जल बचेगा और जल बचेगा तो जीवन बचेगा : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

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      • मुख्यमंत्री ने स्रोत महोत्सव 2026 एवं राज्य स्तरीय कार्यशाला का किया शुभारंभ, नदियों के उद्गम स्थलों और कैचमेंट एरिया के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक एवं समयबद्ध कार्ययोजना पर जोर

          मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

          रायपुर (AkhandBharatHNKP.Com)। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि नदियां केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि प्रदेश की सभ्यता, संस्कृति, कृषि और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा हैं। नदी बचेगी तो जल बचेगा और जल बचेगा तो जीवन बचेगा की भावना के साथ राज्य सरकार नदी संरक्षण को व्यापक जनअभियान का रूप देने की दिशा में काम कर रही है।

          मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

          मुख्यमंत्री ने बुधवार को रायपुर के ओमाया गार्डन में आयोजित स्रोत महोत्सव 2026 एवं राज्य स्तरीय कार्यशाला का शुभारंभ किया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य प्रदेश की नदियों के उद्गम स्थलों और जलग्रहण क्षेत्रों की पहचान कर उनका संरक्षण करना, जल संचयन एवं भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा देना और नदी संरक्षण में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना है। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रदेश में नदी संरक्षण का काम मानचित्रण, संरक्षण, पुनर्भरण, जनभागीदारी और कार्ययोजना इन पांच प्रमुख आधारों पर आगे बढ़ाया जाएगा। प्रत्येक नदी और उसके जलग्रहण क्षेत्र का वैज्ञानिक तरीके से मानचित्रण किया जाएगा। इस दौरान नदी के उद्गम स्थल, प्रवाह क्षेत्र, भूमि उपयोग में हुए बदलाव और नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करने वाले कारणों का अध्ययन किया जाएगा। इसके आधार पर वन एवं वनस्पति संरक्षण, मृदा क्षरण रोकने, पारंपरिक जल संरचनाओं के संरक्षण और भू-जल पुनर्भरण जैसे कार्य किए जाएंगे। कार्यशाला में सीगंगा के संस्थापक एवं आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर डॉ. विनोद तारे, नमामि गंगे मिशन से जुड़े विषय विशेषज्ञ, एनआईटी रायपुर के प्राध्यापक, राज्य एवं जिला स्तरीय समितियों के सदस्य, विभिन्न जिलों के कलेक्टर एवं अधिकारी तथा जल एवं नदी संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत विशेषज्ञ उपस्थित थे।

          https://dprcg.gov.in/post/1787137626/Raipur-If-the-river-is-saved-water-will-be-saved-and-if-water-is-saved-life-will-be-saved-Chief-Minister-Shri-Vishnu-Dev-Sai

          बारिश के पानी को जमीन के भीतर पहुंचाने पर जोर

          मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्षाजल नदी तंत्र और भू-जल का मुख्य आधार है। बारिश के पानी को तेजी से बहकर निकलने देने के बजाय उसे अधिक से अधिक मात्रा में जमीन के भीतर पहुंचाने की जरूरत है। इससे भू-जल स्तर बढ़ेगा, जल स्रोतों को पुनर्जीवन मिलेगा और नदियों में लंबे समय तक पानी बनाए रखने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि नदी संरक्षण केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदाय की भागीदारी जरूरी है। नदी किनारे बसे गांवों में स्थानीय समितियां बनाकर पंचायतों के सहयोग से संरक्षण और पुनरुद्धार के काम किए जाने चाहिए।

          जल संरक्षण के लिए दो महत्वपूर्ण समझौते

          कार्यक्रम के दौरान जल संरक्षण की दिशा में दो महत्वपूर्ण समझौते भी किए गए। राष्ट्रीय जल अकादमी, पुणे के साथ हुए समझौते के माध्यम से जल संरक्षण और जल प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों एवं मैदानी कर्मचारियों का प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण किया जाएगा। वहीं एंट्रिक्स कॉरपोरेशन, बेंगलुरु के साथ हुए समझौते के तहत आधुनिक भू-स्थानिक तकनीक और इसरो की विशेषज्ञता का उपयोग जल संसाधनों की निगरानी और वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए किया जाएगा। प्रारंभिक चरण में कुनकुरी तहसील के करीब 1540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से जल संसाधनों की स्थिति का अध्ययन और निगरानी की जाएगी।

          नीर-नारी-निधि पुस्तक का विमोचन

          कार्यक्रम में मुख्यमंत्री साय ने जल संरक्षण पर आधारित नीर-नारी-निधि पुस्तक का विमोचन भी किया। पुस्तक में जल प्रबंधन, जल संरक्षण, स्थानीय प्रयासों और नवाचारों से जुड़े अनुभवों को शामिल किया गया है। इसमें जल संरक्षण में महिलाओं की भूमिका और भागीदारी को भी प्रमुखता दी गई है। इस दौरान आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर और सीगंगा के संस्थापक डॉ. विनोद तारे ने कहा कि जल सुरक्षा के लिए नदियों के उद्गम स्थलों और उन्हें पोषित करने वाले जल स्रोतों की पहचान और संरक्षण जरूरी है। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय अनुभवों को आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक से जोड़कर जल संरक्षण की कार्ययोजना तैयार करने की जरूरत बताई।

          नदी संरक्षण के लिए पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन जरूरी

          जल संसाधन विभाग के सचिव राजेश सुकुमार टोप्पो ने कहा कि नदी संरक्षण के लिए केवल नदी के बहाव क्षेत्र का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। उद्गम स्थल, भूमि उपयोग, मिट्टी की नमी, भू-जल पुनर्भरण, वनस्पति और मृदा क्षरण समेत पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को समझना जरूरी है। उन्होंने बताया कि कार्यशाला में नौ नदी समूहों पर अलग-अलग चर्चा की जा रही है। क्षेत्र की जरूरत के अनुसार वैज्ञानिक और स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित समाधान तैयार किए जाएंगे। इसके साथ ही कार्यों की जिम्मेदारी और परिणामों के आकलन की समयसीमा भी तय की जाएगी।

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