जब ग्रामीणों की आवाज पहले नहीं सुनी तो अब जनसुनवाई स्थगित होने का श्रेय क्यों : मुकेश राठौर

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      कोरबा (AkhandBharatHNKP.Com)। मानिकपुर ओपन कास्ट परियोजना के विस्तार को लेकर 21 अगस्त को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई स्थगित होने के बाद इसे लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कोरबा जिला कांग्रेस अध्यक्ष मुकेश कुमार राठौर ने मंत्री एवं क्षेत्रीय विधायक लखनलाल देवांगन के हालिया बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए श्रेय लेने की राजनीति का आरोप लगाया है। राठौर ने कहा कि मानिकपुर परियोजना से प्रभावित आठ गांवों के ग्रामीण पूरे घटनाक्रम के प्रत्यक्ष गवाह हैं। उन्हें पता है कि उनकी समस्याओं के समय कौन उनके साथ खड़ा रहा और किससे उन्हें निराशा मिली।

          श्री राठौर ने कहा कि 22 जुलाई को जनसुनवाई की अधिसूचना प्रकाशित होने के बाद प्रभावित आठ गांवों के ग्रामीण अपनी जायज मांगों को लेकर मंत्री देवांगन के पास पहुंचे थे। उन्हें उम्मीद थी कि क्षेत्रीय विधायक एवं मंत्री होने के नाते वे एसईसीएल प्रबंधन और प्रशासन के समक्ष उनका पक्ष मजबूती से रखेंगे। लेकिन ग्रामीणों के अनुसार उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला और कथित तौर पर यह कहकर निराश किया गया कि अब इस स्तर पर कुछ नहीं हो सकता तथा प्रबंधन जो दे रहा है, उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। राठौर ने सवाल किया कि जब ग्रामीण समाधान की उम्मीद लेकर मंत्री के पास पहुंचे थे, तब उनकी समस्याओं को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया? और यदि बाद में मंत्री की पहल से जनसुनवाई स्थगित हुई तो 22 जुलाई से 17 अगस्त के बीच उनके द्वारा की गई ठोस पहल, पत्राचार और बैठकों का विवरण जनता के सामने क्यों नहीं रखा जा रहा?

          पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने ग्रामीणों की आवाज उठाई

          मुकेश राठौर ने कहा कि पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने ग्रामीणों की समस्याओं को एसईसीएल के सीएमडी सहित संबंधित अधिकारियों के समक्ष उठाया। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों की लगातार लामबंदी और पत्राचार के बीच मामला प्रशासन के समक्ष गंभीरता से पहुंचा। इसके बाद कलेक्टर ने ग्रामीणों की मांगों एवं परिस्थितियों को मानवीय दृष्टिकोण से देखते हुए जनसुनवाई स्थगित करने का निर्णय लिया। यह पहला अवसर नहीं है जब किसी जनसमस्या के निर्णायक मोड़ पर पहुंचने के बाद मंत्री देवांगन की ओर से श्रेय लेने का दावा सामने आया हो। उन्होंने बरबसपुर में प्रस्तावित शराब दुकान का उदाहरण देते हुए कहा कि ग्रामीणों के विरोध और पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल के हस्तक्षेप के बाद दुकान नहीं खोलने का निर्णय हुआ। इसके बाद मंत्री की ओर से भी दुकान नहीं खोलने के निर्देश देने का दावा किया गया।

          बरबसपुर और बालको के मामलों का दिया उदाहरण

          इसी प्रकार बालको प्रबंधन द्वारा लघु व्यवसायियों को हटाने के नोटिस के मामले में भी प्रभावित व्यवसायियों ने मंत्री से संपर्क किया था लेकिन वहां से निराशा ही उनके हाथ लगी। बाद में जयसिंह अग्रवाल ने मामला जिला प्रशासन के समक्ष उठाया और प्रशासन की सख्ती के बाद स्थिति शांत हुई और बाद में मंत्री की ओर से बालको प्रबंधन को व्यवसायियों को नहीं हटाने के निर्देश देने का दावा किया गया। उन्होंने कि बरबसपुर, बालको और अब मानिकपुर—तीनों मामलों में जब जनता समस्या लेकर पहुंची थी तब अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई पड़ी, लेकिन जब जनदबाव और प्रशासनिक कार्रवाई निर्णायक मोड़ तक पहुंचती है, तब श्रेय लेने के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप का दावा सामने आ जाता है। अंत में राठौर ने कहा कि मंत्री देवांगन को वास्तव में ग्रामीणों की चिंता है तो श्रेय की राजनीति छोड़कर उनके बीच जाएं, लंबित मांगों के समाधान की लिखित गारंटी दिलाएं और एसईसीएल प्रबंधन को समयबद्ध कार्रवाई के लिए बाध्य करें। जनहित के संघर्ष का श्रेय बयान जारी करने से नहीं, बल्कि संकट के समय जनता के साथ खड़े होने से मिलता है। मानिकपुर के ग्रामीण यह अंतर भली-भांति समझ चुके हैं।

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