ऊर्जा के विस्तार में एल्युमिनियम की बढ़ती भूमिका, बिजली को दूर-दराज तक पहुंचाने में अहम योगदान

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      • सौर और पवन ऊर्जा से लेकर बिजली के बड़े नेटवर्क तक एल्युमिनियम का बढ़ रहा उपयोग

      बालकोनगर (AkhandBharatHNKP.Com)। भारत के तेजी से बढ़ते ऊर्जा क्षेत्र में एल्युमिनियम की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। देश के औद्योगिक विकास, बढ़ते विद्युतीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार के साथ बिजली उत्पादन के साथ-साथ उसे दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचाना भी बड़ी जरूरत बन गया है। ऐसे में हल्के वजन, अच्छी विद्युत चालकता, जंग से बचाव और पुनर्चक्रण की क्षमता के कारण एल्युमिनियम ऊर्जा क्षेत्र के लिए उपयोगी धातु साबित हो रहा है।

          देश में सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं कई बार शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों से दूर स्थापित की जाती हैं। वहां उत्पादित बिजली को लंबी दूरी तक पहुंचाने के लिए मजबूत विद्युत पारेषण नेटवर्क की जरूरत होती है। बिजली के टावरों से लेकर ओवरहेड बिजली लाइनों तक एल्युमिनियम आधारित चालक का व्यापक उपयोग किया जाता है। कम वजन के कारण इनका इस्तेमाल बड़े बिजली नेटवर्क में सुविधाजनक माना जाता है। तांबा बिजली का अच्छा चालक है, लेकिन एल्युमिनियम का वजन काफी कम होता है। समान आयतन के आधार पर एल्युमिनियम की विद्युत चालकता तांबे की करीब 61 प्रतिशत है। इसके बावजूद कम वजन और अपेक्षाकृत कम लागत के कारण लंबी दूरी तक बिजली पहुंचाने वाली लाइनों में इसका व्यापक उपयोग होता है। हल्के चालक बिजली के टावरों पर पड़ने वाले भार को कम करने में मदद करते हैं। इससे बिजली नेटवर्क के विस्तार और स्थापना से जुड़ी लागत को नियंत्रित करने में भी सहायता मिलती है। यही वजह है कि शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ दूरदराज के इलाकों में बिजली पहुंचाने के लिए भी एल्युमिनियम महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

          नवीकरणीय ऊर्जा में भी उपयोग

          एल्युमिनियम का इस्तेमाल केवल बिजली की तारों तक सीमित नहीं है। सौर ऊर्जा परियोजनाओं में सौर पैनलों के ढांचे और उन्हें स्थापित करने वाली संरचनाओं में भी इसका उपयोग किया जाता है। पवन ऊर्जा से जुड़े विभिन्न उपकरणों और विद्युत बुनियादी ढांचे में भी एल्युमिनियम की उपयोगिता बढ़ रही है। इसके अलावा ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े एलएनजी संयंत्र, तेल एवं गैस से जुड़ी सुविधाएं, भंडारण प्रणालियां और पाइपलाइन से संबंधित ढांचे में भी एल्युमिनियम का इस्तेमाल किया जाता है।

          पुनर्चक्रण से पर्यावरण को भी लाभ

          एल्युमिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में इसकी पुनर्चक्रण क्षमता भी शामिल है। इसे दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों की बचत के साथ चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है। ऊर्जा क्षेत्र में इसके बढ़ते उपयोग को भारत के सतत विकास लक्ष्यों से भी जोड़ा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार औद्योगीकरण, शहरीकरण और बढ़ते विद्युतीकरण के कारण भारत की ऊर्जा मांग वर्ष 2027 तक हर साल औसतन 6.3 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। भारत वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन की दिशा में आगे बढ़ने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। इन लक्ष्यों के लिए बिजली पारेषण, ऊर्जा भंडारण और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े स्तर पर बुनियादी ढांचे के विकास की आवश्यकता होगी।

          बालको निभा रहा महत्वपूर्ण भूमिका

          देश की प्रमुख एल्युमिनियम उत्पादक कंपनियों में शामिल भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) भी ऊर्जा क्षेत्र की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने में योगदान दे रही है। कंपनी बिलेट, वायर रॉड, इनगॉट और रोल्ड उत्पादों सहित विभिन्न एल्युमिनियम उत्पादों के माध्यम से बिजली पारेषण एवं वितरण नेटवर्क, विद्युत बुनियादी ढांचे और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को सहयोग प्रदान कर रही है। कंपनी के अनुसार घरेलू एल्युमिनियम वायर रॉड क्षेत्र में बालको की करीब 33 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी है। वर्तमान में कंपनी की वार्षिक उत्पादन क्षमता 5.75 लाख टन है, जिसे बढ़ाकर 10 लाख टन करने की दिशा में काम किया जा रहा है। सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करने, पवन ऊर्जा का उपयोग करने से लेकर बिजली को लंबी दूरी तक पहुंचाने तक, एल्युमिनियम देश के ऊर्जा बुनियादी ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। बढ़ती ऊर्जा मांग और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के साथ आने वाले वर्षों में इसकी उपयोगिता और बढ़ने की संभावना है।

          बालको के इंजीनियर गढ़ रहे एल्यूमिनियम निर्माण का नया अध्याय

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